दिल्ली सुखनवरों का है मरकज़ मगर मियां, उर्दू के कुछ चिराग़ तो पंजाब में भी हैं - जतिन्दर परवाज़

यार पुराने छूट गये तो छूट गये

>> Thursday, July 23, 2009

यार पुराने छूट गये तो छूट गये
कांच के बर्तन टूट गये तो टूट गये

सोच समझ कर होंट हिलाने पड़ते हैं
तीर कमाँ से छूट गये तो छूट गये

शहज़ादे के खेल खिलोने थोड़ी थे
मेरे सपने टूट गये तो टूट गये

इस बस्ती में कौन किसी का दुख रोये
भाग किसी के फूट गये तो फूट गये

छोड़ो रोना-धोना रिश्ते-नातों पर
कच्चे धागे टूट गये तो टूट गये

अब के बिछड़े तो मर जाएँगे 'परवाज़'
हाथ अगर अब छूट गये तो छूट गाये

3 टिप्पणियाँ:

विनोद कुमार पांडेय 23 जुलाई 2009 1:26 am  

badhiya vichar..
badhiya soch..
badhiya kavita..
badhiya laga..
badhayi bhi swikare..

नीरज गोस्वामी 23 जुलाई 2009 3:09 am  

शहज़ादे के खेल खिलोने थोड़ी थे
मेरे सपने टूट गये तो टूट गये
वाह परवाज़ साहेब.... इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिली दाद कबूल फरमाईये...
नीरज

AlbelaKhatri.com 23 जुलाई 2009 5:39 am  

bhai kya baat hai..................
bahut khoob !
chhot gaye ko lekar itni khoob ghhazal kahi ki
hamaare chhakke chhot gaye
badhaai !

तशरीफ लाने का शुक्रिया

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