ग़ज़ल लेखन प्रतियोगिता में जतिन्दर परवाज़ को प्रथम पुरस्कार
>> Saturday, January 09, 2010
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क्या ज़रूरी है कि सब से ही मिलें प्यार के साथ
>> Tuesday, January 05, 2010
क्या ज़रूरी है कि सब से ही मिलें प्यार के साथ
दुश्मनी भी तो हो यारो कहीं दो-चार के साथ
फेसला जंग का शमशीर नहीं कर सकती
चाहिए ख़ून में ग़ेरत भी तो तलवार के साथ
और तो कोई भी रस्ता ही नहीं इस के सिवा
बात बढती है फ़क़त इश्क में इज़हार के साथ
क़त्लो-ग़ारत ही नज़र आते हैं हर सम्त उसे
जगता शहर है जब सुबह के अखवार के साथ
तुम जो हो असल में 'परवाज़' वो ज़ाहिर में रहो
छेड़ख़ानी न करो अपने ही किरदार के साथ
दूरदर्शन पर आज शाम 6 बजे
>> Monday, November 16, 2009
सूचना ...
जतिन्दर परवाज़ को आज शाम (Monday 16th November 2009, 06.00PM) को BAZM (URDU PROGRAMME) में dekhen
आंधियों में दिया जलाऊंगा
>> Tuesday, November 03, 2009
आंधियों में दिया जलाऊंगा
मैं हवाओं को आजमाऊंगा
इतना प्यासा हूँ ऐसा लगता है
इक समन्दर तो पी ही जाऊंगा
अपनी क़िस्मत संवार लूँ पहले
फ़िर तेरी ज़ुल्फ़ को सजाऊंगा
आंसुओं का बनाऊंगा दरिया
और फ़िर उस में डूब जाऊंगा
उस को खुश देखने की चाहत में
उस के हाथों मैं हार जाऊंगा
इक फ़रिश्ता ये कह गया 'परवाज़'
लौट कर एक दिन मैं आऊंगा
दिल मचल रहे हैं
>> Wednesday, October 28, 2009
दिल मचल रहे हैं
ख़्वाब पल रहे हैं
आप की गली के
लोग जल रहे हैं
शाम ढल चुकी है
और चल रहे हैं
धूप चुभ रही है
दिन बदल रहे हैं
बदलो कहाँ हो
खेत जल रहे हैं
सूरज-चन्दा जैसे रौशन
>> Tuesday, October 06, 2009
सूरज-चन्दा जैसे रौशन
हो जाएँ दिल सब के रौशन
आप जो मेरे साथ चलेंगे
हो जाएँगे रस्ते रौशन
दिल को रौशन करने वाले
मेरा घर भी कर दे रौशन
खिड़की से कुछ जुगनू आकर
कर जाते हैं कमरे रौशन
इक दीपक के जल जाने से
दीवारो-दर सारे रौशन
चाँद सा चेहरा कब आएगा
मेरे घर को करने रौशन
