दिल्ली सुखनवरों का है मरकज़ मगर मियां, उर्दू के कुछ चिराग़ तो पंजाब में भी हैं - जतिन्दर परवाज़

आंधियों में दिया जलाऊंगा

>> Tuesday, November 03, 2009

आंधियों में दिया जलाऊंगा
मैं हवाओं को आजमाऊंगा

इतना प्यासा हूँ ऐसा लगता है
इक समन्दर तो पी ही जाऊंगा

अपनी क़िस्मत संवार लूँ पहले
फ़िर तेरी ज़ुल्फ़ को सजाऊंगा

आंसुओं का बनाऊंगा दरिया
और फ़िर उस में डूब जाऊंगा

उस को खुश देखने की चाहत में
उस के हाथों मैं हार जाऊंगा

इक फ़रिश्ता ये कह गया 'परवाज़'
लौट कर एक दिन मैं आऊंगा

6 टिप्पणियाँ:

शोभित जैन 3 नवम्बर 2009 8:14 am  

बेहतरीन ग़ज़ल ... हर शेर लाजबाब

नीरज गोस्वामी 4 नवम्बर 2009 1:49 am  

उस को खुश देखने की चाहत में
उस के हाथों मैं हार जाऊंगा

बहुत खूब...वाह...बहुत अच्छी ग़ज़ल....
नीरज

गौतम राजरिशी 8 नवम्बर 2009 9:07 am  

क्या बात है जतिंदर भाई...क्या बात है!

कमाल का मतला...और अच्छे शेर बुने हैं!

SURINDER RATTI 12 नवम्बर 2009 10:10 pm  

Jatinder Ji,
Bahut pyari rachna hai...
आंधियों में दिया जलाऊंगा
मैं हवाओं को आजमाऊंगा

इतना प्यासा हूँ ऐसा लगता है
इक समन्दर तो पी ही जाऊंगा

अपनी क़िस्मत संवार लूँ पहले
फ़िर तेरी ज़ुल्फ़ को सजाऊंगा
Badhai ...
Surinder

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' 5 दिसम्बर 2009 11:44 am  

जतिन्दर परवाज़ साहब,
अच्छा कलाम पढने को मिला
मुबारकबाद
ये शेर मुझे पसंद आया
उस को खुश देखने की चाहत में
उस के हाथों मैं हार जाऊंगा
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

इस्मत ज़ैदी 18 फरवरी 2010 7:24 pm  

आंधियों में दिया जलाऊंगा
मैं हवाओं को आजमाऊंगा

उस को खुश देखने की चाहत में
उस के हाथों मैं हार जाऊंगा

jatinder sahab ,aaj pahli baar aapka kalaam padhaa ,bahut khoob ,khaas taur par ye do sher mujhe bahut pasand aaye.

तशरीफ लाने का शुक्रिया

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