दिल्ली सुखनवरों का है मरकज़ मगर मियां, उर्दू के कुछ चिराग़ तो पंजाब में भी हैं - जतिन्दर परवाज़

दिल मचल रहे हैं

>> Wednesday, October 28, 2009

दिल मचल रहे हैं
ख़्वाब पल रहे हैं

आप की गली के
लोग जल रहे हैं

शाम ढल चुकी है
और चल रहे हैं

धूप चुभ रही है
दिन बदल रहे हैं

बदलो कहाँ हो
खेत जल रहे हैं

5 टिप्पणियाँ:

AlbelaKhatri.com 28 अक्तूबर 2009 3:03 am  

bahut khoob !

ओम आर्य 28 अक्तूबर 2009 3:19 am  

bahut khub janab!

sada 28 अक्तूबर 2009 4:22 am  

दिल मचल रहे हैं
ख़्वाब पल रहे हैं

आप की गली के
लोग जल रहे हैं

बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Dipak 'Mashal' 28 अक्तूबर 2009 9:30 am  

Jitendar Bhai! jawab nahin aapki soch ka aur shayari ka. main to purana mureed hoon
lekin ab to fan se AC hota ja raha hoon. :)

Jai Hind

गौतम राजरिशी 1 नवम्बर 2009 9:42 pm  

अच्छी ग़ज़ल कहते हैं आप। आपको कई दफ़ा सुना भी है मैंने इ-टीवी उर्दू पर....

ग़ज़ल का तीसरा शेर तनिक स्पष्ट नहीं हो पा रहा है।

तशरीफ लाने का शुक्रिया

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