दिल्ली सुखनवरों का है मरकज़ मगर मियां, उर्दू के कुछ चिराग़ तो पंजाब में भी हैं - जतिन्दर परवाज़

रविवार, जुलाई 26, 2009

बारिशों में नहाना भूल गए

बारिशों में नहाना भूल गए
तुम भी क्या वो ज़माना भूल गए

कम्प्यूटर किताबें याद रहीं
तितलियों का ठिकाना भूल गए

फल तो आते नहीं थे पेड़ों पर
अब तो पंछी भी आना भूल गए

यूँ उसे याद कर के रोते हैं
जेसे कोई ख़ज़ाना भूल गए

मैं तो बचपन से ही हूँ संजीदा
तुम भी अब मुस्कुराना भूल गए

7 टिप्‍पणियां:

prabodh ने कहा…

wah wah

AlbelaKhatri.com ने कहा…

shaandaar ghazal !
jaandaar ghazal !

ओम आर्य ने कहा…

BAHUT BAHUT HI SUNDAR ........AAPANE YAAD DILAYE WO JAMANA HAM BHI BHUL GAYE THE......BAHUT SUNDAR RACHANA

nareshkumargoswami ने कहा…

मैं तो बचपन से ही हूँ संजीदा
तुम भी अब मुस्कुराना भूल गए

वाह वाह

दिगम्बर नासवा ने कहा…

फल तो आते नहीं थे पेड़ों पर
अब तो पंछी भी आना भूल गए

लाजवाब शेर हैं..........

M VERMA ने कहा…

मैं तो बचपन से ही हूँ संजीदा
तुम भी अब मुस्कुराना भूल गए
बहुत शानदार
वाह

venus kesari ने कहा…

पूरी गजल एकदम कमाल धमाल है
मक्ता के लिए अगल से दाद कबूल फरमाए

मैं तो बचपन से ही हूँ संजीदा
तुम भी अब मुस्कुराना भूल गए

क्या बात है

वीनस केसरी