शजर पर एक ही पत्ता बचा है
>> Wednesday, July 29, 2009
शजर पर एक ही पत्ता बचा है
हवा की आँख में चुबने लगा है
नदी दम तोड़ बैठी तशनगी से
समन्दर बारिशों में भीगता है
कभी जुगनू कभी तितली के पीछे
मेरा बचपन अभी तक भागता है
सभी के खून में गैरत नही पर
लहू सब की रगों में दोड़ता है
जवानी क्या मेरे बेटे पे आई
मेरी आँखों में आँखे डालता है
चलो हम भी किनारे बैठ जायें
ग़ज़ल ग़ालिब सी दरिया गा रहा है

3 टिप्पणियाँ:
बड़ी ही शानदार रचना है
दिल के जज्बातों को आपने बहुत खूबसूरती से उतार दिया है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
सुन्दर अभिव्यक्ति
खूबसूरत गजल
वीनस केसरी
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