दिल्ली सुखनवरों का है मरकज़ मगर मियां, उर्दू के कुछ चिराग़ तो पंजाब में भी हैं - जतिन्दर परवाज़

शजर पर एक ही पत्ता बचा है

>> Wednesday, July 29, 2009

शजर पर एक ही पत्ता बचा है
हवा की आँख में चुबने लगा है

नदी दम तोड़ बैठी तशनगी से
समन्दर बारिशों में भीगता है

कभी जुगनू कभी तितली के पीछे
मेरा बचपन अभी तक भागता है

सभी के खून में गैरत नही पर
लहू सब की रगों में दोड़ता है

जवानी क्या मेरे बेटे पे आई
मेरी आँखों में आँखे डालता है

चलो हम भी किनारे बैठ जायें
ग़ज़ल ग़ालिब सी दरिया गा रहा है

3 टिप्पणियाँ:

‘नज़र’ 29 जुलाई 2009 3:32 am  

बड़ी ही शानदार रचना है

Science Bloggers Association 29 जुलाई 2009 5:31 am  

दिल के जज्‍बातों को आपने बहुत खूबसूरती से उतार दिया है।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

venus kesari 29 जुलाई 2009 10:47 am  

सुन्दर अभिव्यक्ति
खूबसूरत गजल

वीनस केसरी

तशरीफ लाने का शुक्रिया

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