दिल्ली सुखनवरों का है मरकज़ मगर मियां, उर्दू के कुछ चिराग़ तो पंजाब में भी हैं - जतिन्दर परवाज़

मुझ को खंज़र थमा दिया जाए

>> Monday, August 03, 2009

मुझ को खंज़र थमा दिया जाए
फिर मिरा इम्तिहाँ लिया जाए
ख़त को नज़रों से चूम लूँ पहले
फिर हवा में उड़ा दिया जाए
तोड़ना हो अगर सितारों को
आसमाँ को झुका लिया जाए
जिस पे नफरत के फूल उगते हों
उस शजर को गिरा दिया
एक छप्पर अभी सलामत है
बारिशों को बता दिया जाए
सोचता हूँ के अब चरागों को
कोई सूरज दिखा दिया जाए

6 टिप्पणियाँ:

AlbelaKhatri.com 3 अगस्त 2009 11:45 pm  

kya khoob........
bahut khoob...

एक छप्पर अभी सलामत है
बारिशों को बता दिया जाए

jiyo bhai jiyo..............badhaai !

‘नज़र’ 4 अगस्त 2009 6:05 am  

वाह-वाह, बहुत ख़ूब
---
1. चाँद, बादल और शाम
2. विज्ञान । HASH OUT SCIENCE

venus kesari 4 अगस्त 2009 11:55 am  

ख़त को नज़रों से चूम लूँ पहले
फिर हवा में उड़ा दिया जाए

एक छप्पर अभी सलामत है
बारिशों को बता दिया जाए

सोचता हूँ के अब चरागों को
कोई सूरज दिखा दिया जाए

इन शेरोन को बार बार पढ़ रहा हूँ उअर भगवान् से विनती कर रहा हूँ की काश मैं 8-10 साल में भी इस तरह लिख sakoon

वीनस केसरी

नीरज गोस्वामी 5 अगस्त 2009 7:24 am  

जिस पे नफरत के फूल उगते हों
उस शजर को गिरा दिया

एक छप्पर अभी सलामत है
बारिशों को बता दिया जा

वाह...बेजोड़ ग़ज़ल...शुक्रिया.
नीरज

shyam jagota 6 अगस्त 2009 12:23 am  

wah wah

अविनाश वाचस्पति 20 सितम्बर 2009 10:41 am  

बारिश की मुखबिरी
चलती रहेगी उनकी दादागिरी।

सूरज को दिखलाएंगे चिराग
तो वो दिन में भी बादल के पीछे
आंख मिचोनी खेलेगा।

तशरीफ लाने का शुक्रिया

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