दिल्ली सुखनवरों का है मरकज़ मगर मियां, उर्दू के कुछ चिराग़ तो पंजाब में भी हैं - जतिन्दर परवाज़

शुक्रवार, अगस्त 07, 2009

सहमा सहमा हर इक चेहरा मंज़र मंज़र खून में तर

सहमा सहमा हर इक चेहरा मंज़र मंज़र खून में तर
शहर से जंगल ही अच्छा है चल चिड़िया तू अपने घर

तुम तो ख़त में लिख देती हो घर में जी घबराता है
तुम क्या जानो क्या होता है हाल हमारा सरहद पर

बेमोसम ही छा जाते हैं बादल तेरी यादों के
बेमोसम ही हो जाती है बारिश दिल की धरती पर

आ भी जा अब जाने वाले कुछ इन को भी चैन पड़े
कब से तेरा रस्ता देखें छत आँगन दीवार-ओ-दर

जिस की बातें अम्मा अब्बू अक्सर करते रहते हैं
सरहद पार नजाने कैसा वो होगा पुरखों का घर

5 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

खूबसूर शेर

अमिताभ मीत ने कहा…

क्या बात है. बहुत उम्दा शेर.

venus kesari ने कहा…

हर शेर दास्ताँ कहता हुआ सा जान पड़ता है

बहुत सुन्दर गजल पढ़वाई आपने
आपकी गजलें मुझे बहुत पसंद आती है

वीनस केसरी

संजीव गौतम ने कहा…

भाई जतिन्दर ब्लाग जगत में देखकर बहुर खुशी हुई ग़ज़ल बहुत अच्छी है हमेशा की तरह बेहद खूबसूरत हालांकि हमारी मुलाकात या बातचीत नहीं है लेकिन पत्रिकाओं में आपको पढा है. अब यहां देखकर अच्छा लग रहा है. उम्मीद है मुलाकात आगे भी होगी.

amit ने कहा…

जिंदगी से तो मैं मायूस था मगर
ग़ज़लों ने आपकी हमे जीना सिखा दिया

अमित शर्मा