दिल्ली सुखनवरों का है मरकज़ मगर मियां, उर्दू के कुछ चिराग़ तो पंजाब में भी हैं - जतिन्दर परवाज़

यूँ ही उदास है दिल बेक़रार थोड़ी है

>> Monday, August 10, 2009

यूँ ही उदास है दिल बेक़रार थोड़ी है
मुझे किसी का कोई इंतज़ार थोड़ी है

नज़र मिला के भी तुम से गिला करूँ कैसे
तुम्हारे दिल पे मेरा इख्तियार थोड़ी है

मुझे भी नींद न आए उसे भी चैन न हो
हमारे बीच भला इतना प्यार थोड़ी है

खिज़ा ही ढूंडती रहती है दर-ब-दर मुझको
मेरी तलाश मैं पागल बहार थोड़ी है

न जाने कौन यहाँ सांप बन के डस जाए
यहाँ किसी का कोई एतबार थोड़ी है

4 टिप्पणियाँ:

अनूप शुक्ल 10 अगस्त 2009 10:17 am  

बड़े शानदार शेर कह डाले भैये।

AlbelaKhatri.com 10 अगस्त 2009 10:24 am  

bhai waah waah
gazab ki kahan....................
gazab ki ghazal

saare she'r ek se badhkar ek................
badhaai !

संजीव गौतम 10 अगस्त 2009 7:17 pm  

न जाने कौन यहाँ सांप बन के डस जाए
यहाँ किसी का कोई एतबार थोड़ी है
जी चुरा लिया जतिन्दर भाई इस शेर ने हालांकि पूरी ग़ज़ल ही उम्दा है. कसी हुई बहुत बढिया.

ओम आर्य 11 अगस्त 2009 1:56 am  

नज़र मिला के भी तुम से गिला करूँ कैसे
तुम्हारे दिल पे मेरा इख्तियार थोड़ी है

badi hi sundar bhaw liye huye ye panktiya......bahut badhaee

तशरीफ लाने का शुक्रिया

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