दिल्ली सुखनवरों का है मरकज़ मगर मियां, उर्दू के कुछ चिराग़ तो पंजाब में भी हैं - जतिन्दर परवाज़

क्यों खड़ी हम ने की हैं दीवारें

>> Friday, September 18, 2009

क्यों खड़ी हम ने की हैं दीवारें
दूर जब कर रही हैं दीवारें

जैसे कोई सवाल करता है
इस तरह देखती हैं दीवारें

अब मुलाक़ात भी नहीं मुमकिन
दरमियाँ आ गई हैं दीवारें

इक झरोका भी इन में रख लेना
रौशनी रोकती हैं दीवारें

बारिशों ने गिरा दिया छप्पर
सिर्फ़ अब रह गई हैं दीवारें

लग के दीवानों-ओ-दर से रोता हूँ
और मुझे देखती हैं दीवारें

कितना दुशवार है सफ़र 'परवाज़'
हर क़दम पर उठी हैं दीवानें

5 टिप्पणियाँ:

बेनामी 18 सितम्बर 2009 5:50 am  

wah......

विनय ‘नज़र’ 18 सितम्बर 2009 6:48 am  

वल्लाह बेहद ख़ूबसूरत अशआर

भूतनाथ 20 सितम्बर 2009 12:07 am  

अरे वाह....ये शख्स भी मेरी तरह "पगला"
है....हाँ मगर इसके भीतर इक जलवा है....!!

श्रद्धा जैन 26 सितम्बर 2009 11:02 pm  

इक झरोका भी इन में रख लेना
रौशनी रोकती हैं दीवारें
bahut khoobsurat sher

Devi Nangrani 24 अक्तूबर 2009 5:20 pm  

जैसे कोई सवाल करता है
इस तरह देखती हैं दीवारें

bahut hi taseer hai har sher mein

DeviNnangrani

तशरीफ लाने का शुक्रिया

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